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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रिये! तुम आ जाओ ना ( शिवकुमार शर्मा)

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         प्रिये! तुम आ जाओ ना एक पल यूं साथ बैठकर, दो बातें मेरी सुन लो ना, कुछ कहने दो मुझको भी, कुछ तो तुम भी कह दो ना। बस यूं एकटक देखो बस,  ये पलकें ना झपकाओ तुम, मुझको नजरों ही नज़रों, सब शिकवे बयां कर लेने दो। वो ठहाके की हंसी तुम्हारी, सुने बरसों बीत गए, मेरी नादानी हरकत पर, तुम फिर थोड़ा हँस लो ना। यूं भावुक से अंदाज में,  कुछ बातें करते-करते, अपने सर को मेरे , कांधे पर तुम रख दो ना। दुनिया की रीति से डरकर, यूं उदास होकर ना बैठा करो, गले लगाकर मुझको अपने, हाथों को थोड़ा कस लो ना। आओ कल्पना की दुनिया में, हम-तुम दोनों कुछ-क्षण चलें, तुम भी मुझको अपना लेना, मैं तुमको गले लगा लूंगा। ये मिलन आज इतिहास बने, कुछ यूं तुम मिल जाओ ना, मैं बनूँ  प्रेमी भँवरा सा,  तुम बन कुसुम खिल जाओ ना। कोई प्रेम की तान सुनाओ ना, प्रिये!  तुम आ जाओ ना । -कवि शिवकुमार शर्मा (शिवा)✍🏼✍🏼

नारी दिवस ( नेहा गौतम)

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  महिला दिवस अरे!आज 8 मार्च का दिन है, महिला दिवस के सम्मान में चारो तरफ कवितायें और स्लोगन कहाँ कम है। मीरा को ज़हर पिलाना और सतियों के नाम पर स्त्री को जलाना, अरे!ये समाज का कैसा प्रचलन है।। कहनेे को तो वह शक्ति है, फिर वो क्यों अब तक बनी गुमनाम हस्ती है। कहनेे को तो उसे कहा गया पुरुषो जैसे अधिकारों की अधिकारी, फिर वो क्यों अब तक बन कर रह गई अबला बेचारी।। क्यों जब-जब उसकी आबरू पर दाग लगाया गया,  हर बार उसे ही समाज में गलत ठहराया गया। क्यों उसके पहनावे पर सवाल उठाया गया, क्यों उसे ही समाज में बुरा नजरिया दिखाया गया।। क्यों बेटे की चाहत के लिए, उसकी कोख में पल रही बच्ची को मरवाया गया। क्यों उसे ही दहेज के नाम पर, आग में जलाया गया।। क्यों रुक्मणि को ,राजा के द्वारा जिंदा ही चिनवाया गया। क्यों सबको शिक्षित करने वाली को, शिक्षा से दूर करवाया गया।। उनकी इस व्यथा को महसूस करके नेहा ये कह रही:- जिस दिन औरत को दहेज के लिए जलाया नहीं जाए, जिस दिन उसकी आबरू पर कोई दाग  लगाया नहीं  जाए। जिस दिन उसे शिक्षा से दूर नहीं करवाया जाए, जिस दिन भ्रूण में उसकी बच्ची को ना मरवाया जाए। जि...

हिन्दी कविता - नारी ( शिव कुमार शर्मा)

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        नारी       अनन्त वनस्पति, सुन्दर  अनुपम पुष्प, असीमित जल से पूरित सागर-नदियां, अम्बर छूते पर्वत, दूर तक फैले मैदान, झर-झर करते झरने, तपते  रेगिस्तान, सबको   समेटे   खड़ी  है  यह  प्रकृति, नित्य - नियमों  के बन्धन  में  बंधकर, कभी कर्मविचलित नहीं होती प्रकृति, क्योंकि   वह    एक       नारी     है । दावानल,   भुकम्प,    सुनामी,    बाढ़,  खनन,  भूस्खलन,   आपदाएं   हजार, मानवनिर्मित   कष्ट-अपार,  कुविकार, जल, वथल,  नभ, वायु,   सब   दूषित फिर  भी   निजसन्तान  को   कोख में, सुरक्षित रखकर मङ्गल   करती प्रकृति, क्योंकि    वह      एक     नारी      है। बस यूं ही घर घर में अनेकों दुखों को सहती अनेको   जिम्मेवारियों   का  ...

तुम्हारा आना (शिवकुमार शर्मा)

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आगमन तुम्हारे आगमन से हर्षित होकर ये आसमां जल बरसाने लगा है। अपनी मोहोब्बत को प्रदर्शित करता  धरती से दिल को लगाने लगा है रूठा था जो लम्बे समय से  स्वयं तुम्हें मनाने लगा है गुजरे जो तुम बिन अब उन लम्हों की प्यास बुझाने लगा है। दूर होकर जो पास आते हो अदा तुम्हारी कुछ ठीक नही कैसे गुजरे तुम बिन वो दिन,   हाल-ए दिल सुनाने लगा है। तुम उसकी थी वो तुम्हारा लेकिन  फिर से तुम्हे अपनाने लगा है। ये साथ कभी भी छूटे ना हम-तुम में कोई फिर रूठे ना छूट जाए सारा जग लेकिन अपना ये रिश्ता टूटे ना -कवि शिवकुमार शर्मा(शिवा)✍🏼

अपनों के रूप में वैरी (अभिषेक शर्मा)

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             अपनों के रूप में वैरी।                                                                             तरक्की देख कर थोड़ी हमारी, जलने लगते हैं अपने ही। उनसे आगे न बढ़ पाए हम, देखते रहते है सपने ही।।    शायद ये लगता उनको, हम उनसे बेहतर कर सकते। उन्हें कहीं दूर छोड़ पीछे ही, अपना नाम ऊंचा कर सकते।।   ले जाती ये ईर्ष्या उनको, देखो किस मुकाम पर। नीचा दिखाने को हमको फिर, तड़पे वो भी देखो पल हर।। कभी तो ये भाव बने भयंकर, जान हमारी वे जाने मामूली। वाण वचनों के कटाक्ष चलाते, हमें जान देना भी लगे जरूरी।। बस उनका तो रस्ता साफ हो, जाता ना कुछ अपना प्यारा। दुख तो उनको होता इसका, जिन्होंने घर का सदस्य गंवाया।। राजनीति चले हर क्षेत्र में, चाहे करे किसी भी काम को। बड़े बड़ों से जुड़ा संपर्क, जो चाहे न दूजा इनसा हो।। ख्याति मिले बस इन्हे ही सब, चा...

भारत माँ का मुकुट हिमाचल

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 https://youtu.be/KsW7b7qD5uM   भारत माँ का मुकुट हिमाचल https://youtu.be/KsW7b7qD5uM यह मुकुट है भारत मैया का देवों की पावन धरती है। हिम शिखरों की शोभा अनुपम  सबके मन को हरती है। यह धरती शूरों वीरों की संतों की और फकीरों की  यह धरती है किसानों की जनपालक और रखवालों की यह स्वर्ग  है भारत भूमि का जहां महादेव भी वास करें ग्राम ग्राम में देव रहें नवदुर्गा जहां निवास करे छोटे छोटे झरने लाखों पञ्चनदियों का प्रदेश है शान्ति प्रिय अनुशासन बद्घ यहां प्रेम भरा परिवेश है पर्वत की ऊंची चोटी पर शिवधाम  मणिमहेश है  नव दुर्गा के धाम यहां  देवों से भरा प्रदेश है । यमुना सतलुज रावी व्यास  निर्मलजलधार बहाती हैं  तांडी में मिलकर चंद्रा-भागा  चिनाब बन जाती है। सुंदरता के कारण जिसकी, दुनिया में अलग पहचान है पुरा भारत है "काया" तो  हिमाचल उसकी "जान" है। जहां मां सती के नयन गिरे, वहां नैना देवी रहती है। जहां ज्योति गिरी माँ, ज्वालामुखी की निर्मल ज्योति जगती है। चिन्ता हरती चिन्तापूर्णी, किन्नर कैलाश किन्नौर है। मां शूलिनी सोलन बसी, बाला सुन्दरी सिरमौ...

किसकी सुनूं? (-कवि अभिषेक शर्मा)

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किसकी सुनूं? मन की सुनूं या तन की सुनूं, भूखे किसी निर्धन की सुनूं। सुनूं किसी दौलत के प्यारे की, या फिर किसी कलम की सुनूं।। सूरज की किरण की सुनूं, खास किसी मधुबन की सुनूं। सबसे आगे रख कर तुमको, अपने इस चित प्रसन्न की सुनूं।। सुबह सुनूं या शाम सुनूं, पवित्र कोई यूं ज्ञान सुनूं। लाचार से इंसान की सुनूं, बदले इस जहान की सुनूं।। रुके कदमों की आवाज सुनूं, बुझे जो चिराग उस शाम की सुनूं। जीवन को समझ खिलौना गए जो, जज़्बे ताकत मैं कहां की सुनूं।। जन्म मृत्यु के सच की सुनूं, शान से जिए जो उन की सुनूं। सुनते सुनते निकालूं जीवन, कुछ तुम भी सुनो कुछ मैं भी सुनूं।। हारी उन आंखों की सुनूं, धोखेबाजों की मीठी जुबान की सुनूं। सब खोकर हस्ता उस जान की सुनूं, पाकर सब किए अभिमान की सुनूं।। अपने प्रेमी जान की सुनूं, सबसे प्यारी मेरी मां की सुनूं। स्वार्थी हुए इंसान की सुनूं, या भारत मां के जवान की सुनूं।। तारों भरे ये गगन की सुनूं, किसी के सच्चे मन की सुनूं। सहायता करते समक्ष रखा जो, चित्रकार भईया की सुनूं।। संतुष्ट किसान के मन की सुनूं, सच्चे किसी के स्वप्न की सुनूं। किस्सा जीत हार का सुनूं, कहानी पिता के ...

पुस्तकालय: (लेखक:- शिवा शर्मा)

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                                पुस्तकालय :  विविधपुस्तकानां  सङ्ग्रह: यत्र भवति स: पुस्तकालय: इति कथ्यते । पुस्तकानामालय: इति पुस्तकालय:। मया अनुभवङ्कृतं यत्  पुस्तकालये अवर्णनीयैव ऊर्जा सञ्चरति। शब्दगुणकमाकाशमिति दर्शनशास्त्रे मया पठितं परन्तु पुस्तकालये गत्वा अहमस्य साक्षादनुभवमपि कृतवान्।  पुस्तकालयस्य प्रकोष्ठं गत्वैव मस्तिष्के ज्ञानधारा प्रवहति। बुद्धौ तीव्रता आगच्छति। अध्ययने मन: रमते। पठितविषयस्य शीघ्रमेव बोधं जायते। विषय: सरल: भवति। एका अपरैव शान्तिर्भवति पुस्तकालये। एतत् पुस्तकस्थज्ञानस्य प्रभाव: अस्ति। तस्यैव ज्ञानस्य ऊर्जा वातावरणे तनुते। तदा य: कोपि तस्य ज्ञानस्य मार्गे आगच्छति तस्य मस्तिष्के परमानन्दं भवति अतः स: स्वाध्यायप्रिय: ज्ञानस्य पिपासु च जायते।  तत: छात्रै: अध्ययनार्थं पुस्तकालयं नूनमेव गन्तव्यानीति। -शिवकुमार: शर्मा (संस्कृत शिक्षक: नाङ्गे ठाकुर: बिलासपुरम्) .................. हिन्दी ......................  विभिन्न पुस्तकों का संग्रह जहां होता है उसे पुस्...